वार्ड नंबर 23 की उस घटना की, जिसने एक तरफ तो स्थानीय लोगों को राहत दी है, लेकिन दूसरी तरफ कानून व्यवस्था पर कई बड़े और गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।"

"रविवार सुबह दुर्गापुर में भाजपा कार्यकर्ताओं ने अवैध शराब के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए कई घरों में छापेमारी की। स्थानीय लोगों के अनुसार, लंबे समय से पुलिस की उदासीनता के कारण यहाँ अवैध धंधा फला-फूल रहा था। लेकिन इस घटना के बाद बहस अब इस बात पर छिड़ गई है कि आखिर कानून व्यवस्था की कमान किसके हाथ में है?"

​"सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो काम पुलिस और प्रशासन का है, क्या वह अब राजनीतिक दल के कार्यकर्ता करेंगे? भले ही स्थानीय लोग शराब के अवैध कारोबार से परेशान हों और विरोध जताना उनका हक हो, लेकिन कानून की भाषा में 'मॉब जस्टिस' या खुद छापेमारी करने का अधिकार किसी भी राजनीतिक दल के नेताओं को किसने दिया? क्या कोई भी व्यक्ति किसी के घर या दुकान में घुसकर जबरन तलाशी ले सकता है या सामान जब्त कर सकता है?"
​ "और सबसे निराशाजनक बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान पुलिस क्या कर रही थी? क्या प्रशासन वाकई इतना असहाय हो चुका है कि उसे कानून लागू करवाने के लिए राजनीतिक दलों के हस्तक्षेप का इंतज़ार करना पड़ रहा है? पुलिस की इस 'मूकदर्शक' भूमिका पर अब आम जनता भी सवाल उठा रही है।"

​"अगर पुलिस अपना काम ईमानदारी से करती, तो शायद आज स्थिति यहाँ तक न पहुँचती। आज यह छापेमारी भाजपा ने की है, कल कोई और दल करेगा। क्या हम भीड़तंत्र की ओर बढ़ रहे हैं? क्या प्रशासनिक विफलता ही ऐसी घटनाओं की जड़ है? इस पूरे मामले पर प्रशासन की चुप्पी कई सवाल छोड़ गई है, जिनका जवाब देना अब ज़रूरी है।"
भीड़तंत्र या प्रशासनिक विफलता? दुर्गापुर में अवैध शराब के नाम पर भाजपा के 'एक्शन' पर उठे सवाल